अभ्यासमाला समाधान: रसखान (कृष्णा-महिमा)
कविता का सारांश (Summary)
'कृष्णा-महिमा' के अंतर्गत संकलित छंदों में अनन्य कृष्णभक्त मुस्लिम कवि रसखान की अनन्य भक्ति भावना प्रकट हुई है। कवि श्रीकृष्ण और उनकी लीला-भूमि ब्रज के प्रति इस कदर समर्पित हैं कि वे हर जन्म में वहीं रहना चाहते हैं—चाहे वे मनुष्य बनें, पशु बनें, पत्थर बनें या पक्षी। वे कृष्ण की लाठी और कंबल के बदले तीनों लोकों का राज त्यागने और नंद की गायों को चराकर आठों सिद्धियों व नवों निधियों का सुख भूलने को तैयार हैं। श्रीकृष्ण के धूल भरे बाल-रूप के सौंदर्य के आगे वे कामदेव और चंद्रमा के सौंदर्य को भी तुच्छ मानते हैं। अंत में, गोपियों के माध्यम से वे कृष्ण का सारा स्वांग (वेष) धारण करने की तीव्र इच्छा प्रकट करते हैं, परंतु कृष्ण के अधरों पर सजी मुरली (बांसुरी) को अपने होठों पर रखने से साफ़ मना करते हैं क्योंकि वे उसे अपनी सौत मानती हैं।
1. सही विकल्प का चयन करो :
(क) रसखान कैसे कवि थे?
उत्तर: (1) कृष्णभक्त
(ख) कवि रसखान की प्रामाणिक रचनाओं की संख्या है -
उत्तर: (3) चार
(ग) पत्थर बनकर कवि रसखान कहाँ रहना चाहते हैं ?
उत्तर: (2) गोवर्धन पर्वत पर
(घ) बालक कृष्ण के हाथ से कौआ क्या लेकर भागा ?
उत्तर: (4) माखन-रोटी
2. एक शब्द में उत्तर दो :
(क) रसखान ने किनसे भक्ति की दीक्षा ग्रहण की थी ?
उत्तर: गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से
(ख) 'प्रेमवाटिका' के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: रसखान
(ग) रसखान की काव्य-भाषा क्या है ?
उत्तर: ब्रजभाषा
(घ) आराध्य कृष्ण का वेष धारण करते हुए कवि अधरों पर क्या धारण करना नहीं चहते ?
उत्तर: मुरली (बांसुरी)
(ङ) किनकी गाय चराकर कवि रसखान सब प्रकार के सुख भुलाना चाहते हैं ?
उत्तर: नंद बाबा की
3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :
(क) कवि रसखान कैसे इंसान थे ?
उत्तर: कवि रसखान कोमल हृदयवाले और भावुक प्रकृति के इंसान थे。
(ख) कवि रसखान किस स्थिति में गोपियों के कृष्ण-प्रेम से अभिभूत हुए थे ?
उत्तर: कवि रसखान श्रीमद्भागवत का फारसी अनुवाद पढ़कर गोपियों के कृष्ण-प्रेम से अभिभूत हुए थे。
(ग) कवि रसखान ने अपनी रचनाओं में किन छंदों का अधिक प्रयोग किया है ?
उत्तर: कवि रसखान ने अपनी रचनाओं में दोहा, कवित्त और सवैया छंदों का अधिक प्रयोग किया है。
(घ) मनुष्य के रूप में कवि रसखान कहाँ बसना चाहते हैं?
उत्तर: मनुष्य के रूप में कवि रसखान ब्रज-गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच बसना चाहते हैं。
(ङ) किन वस्तुओं पर कवि रसखान तीनों लोकों का राज न्योछावर करने को प्रस्तुत हैं ?
उत्तर: कवि रसखान श्रीकृष्ण की लाठी (लकुटी) और कंबल (कामरिया) पर तीनों लोकों का राज न्योछावर करने को प्रस्तुत हैं。
4. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):
(क) कवि का नाम 'रसखान' किस प्रकार पूर्णतः सार्थक बन पड़ा है ?
उत्तर: रसखान का अर्थ है 'रस की खान'। उनकी रचनाओं में भक्ति-रस, प्रेम-रस और काव्य-रस तीनों प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं, जिसके कारण उनका नाम पूर्णतः सार्थक बन पड़ा है।
(ख) 'जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कुल-कदंब की डारन' - का आशय क्या है ?
उत्तर: इसका आशय यह है कि यदि कवि अगले जन्म में पक्षी (खग) बनें, तो वे यमुना नदी के किनारे स्थित कदंब के पेड़ों की डालियों पर ही अपना बसेरा बनाना चाहते हैं, ताकि कृष्ण की यादों से जुड़े रह सकें।
(ग) 'वा छबि कों रसखानि बिलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी' - का तात्पर्य बताओ।
उत्तर: इसका तात्पर्य है कि बालक कृष्ण के धूल से सने अत्यंत सुंदर रूप को देखकर कवि रसखान उन पर करोड़ों कामदेव और चंद्रमाओं का सौंदर्य भी न्योछावर (वारत) करने को तैयार हैं。
(घ) “भावतो वोहि मेरे 'रसखानि', सो तेरे कहे सब स्वांग भरौंगी" का भाव स्पष्ट करो।
उत्तर: इसका भाव यह है कि सखी दूसरी सखी से कहती है कि श्रीकृष्ण मेरे मन को बहुत भाते हैं, इसलिए उनके प्रेम में वशीभूत होकर मैं उनके जैसा रूप और सारा स्वांग रचने को सहर्ष तैयार हूँ।
5. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में) :
(क) कवि रसखान अपने आराध्य का सान्निध्य किन रूपों में प्राप्त करना चाहते हैं ?
उत्तर: कवि रसखान प्रत्येक स्थिति में अपने आराध्य श्रीकृष्ण का सान्निध्य चाहते हैं। वे मनुष्य बनकर ग्वालों के बीच, पशु बनकर नंद की गायों के बीच, पत्थर बनकर गोवर्धन पर्वत पर और पक्षी बनकर यमुना किनारे कदंब की डालियों पर वास करना चाहते हैं ताकि ब्रजभूमि से उनका संबंध अटूट रहे।
(ख) अपने उपास्य से जुड़े किन उपकरणों पर क्या-क्या न्योछावर करने की बात कवि ने की है ?
उत्तर: कवि कृष्ण की लाठी और कंबल पर तीनों लोकों का राज्य न्योछावर करना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त, वे नंद की गायों को चराने के बदले आठों सिद्धियों और नौ निधियों के सुख को तथा ब्रज के वनों, बागों और कटीली झाड़ियों (करील के कुंजन) पर सोने के करोड़ों महलों को न्योछावर करने की बात करते हैं।
(ग) कवि ने श्रीकृष्ण के बाल-रूप की माधुरी का वर्णन किस रूप में किया है ?
उत्तर: कवि कहते हैं कि श्यामवर्ण बालक कृष्ण धूल से सने हुए आँगन में खेल और खा रहे हैं, जो अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। उनके सिर पर सुंदर चोटी बंधी है, पैरों में पैंजनी बज रही है और उन्होंने पीली धोती पहनी है। अंत में एक भाग्यशाली कौआ उनके हाथ से माखन-रोटी छीनकर भाग जाता है।
(घ) कवि ने अपने आराध्य की तरह वेश धारण करने की इच्छा व्यक्त करते हुए क्या कहा है ?
उत्तर: कवि गोपियों के माध्यम से कहते हैं कि वे कृष्ण की तरह सिर पर मोरपंख धारण करेंगी, गले में गुंज की माला पहनेंगी, पीतांबर ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर ग्वालों के साथ वन-वन फिरेंगी। परंतु, वे कृष्ण के होठों पर सजी मुरली को अपने होठों से स्पर्श नहीं कराएंगी क्योंकि वह उनकी सौत जैसी है।
6. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में):
(क) कवि रसखान का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो।
उत्तर: कवि रसखान हिंदी साहित्य की कृष्णभक्ति-काव्यधारा के एक अत्यंत प्रमुख और अनन्य मुसलमान कवि हैं। उनका जन्म 1533 ई. और मृत्यु 1618 ई. के आसपास मानी जाती है। उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली थी। रसखान की चार प्रमुख प्रामाणिक रचनाएँ मिलती हैं: 'सुजान-रसखान', 'प्रेमवाटिका', 'दानलीला' और 'अष्टयाम'। उनकी काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें सहजता, मधुरता और सरसता कूट-कूट कर भरी है। उन्होंने अपने काव्य में दोहा, कवित्त और सवैया छंदों का बहुत ही सुंदर और मार्मिक प्रयोग किया है, जिससे पाठक रस की अनुभूति करता है।
(ख) कवि रसखान की कृष्ण-भक्ति पर प्रकाश डालो।
उत्तर: रसखान की कृष्ण-भक्ति अत्यंत अनन्य, निश्छल और तल्लीनता से परिपूर्ण है। दिल्ली के शाही राजवंश में जन्म लेने के बाद भी उन्होंने राजसी वैभव और राज्य-लिप्सा को त्यागकर कृष्ण की भक्ति को चुना। उनकी भक्ति केवल श्रीकृष्ण के प्रति ही नहीं, बल्कि उनके जीवन और लीलाओं से जुड़े हर स्थान जैसे गोकुल, ब्रज, गोवर्धन पर्वत और यमुना के प्रति भी अगाध है। वे कृष्ण की संगति पाने के लिए सांसारिक वैभव, आठों सिद्धियाँ, नौ निधियाँ और यहाँ तक कि मोक्ष का सुख भी सहर्ष त्यागने को तैयार हैं। उनका संपूर्ण जीवन और साहित्य पूरी तरह से कृष्ण-प्रेम में डूबा हुआ है।
(ग) पठित छंदों के जरिए कवि रसखान ने क्या-क्या कहना चाहा है ?
उत्तर: पठित छंदों के माध्यम से कवि ने श्रीकृष्ण के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और आत्मसमर्पण को व्यक्त किया है। प्रथम छंद में वे पुनर्जन्म होने पर ब्रज के ग्वाल, गाय, पत्थर या पक्षी के रूप में कृष्ण के निकट रहने की कामना करते हैं। दूसरे छंद में वे कृष्ण की वस्तुओं पर संसार के सभी भौतिक सुखों को तुच्छ समझकर न्योछावर करने का संदेश देते हैं। तीसरे छंद में बालक कृष्ण के अलौकिक बाल-सौंदर्य और उनकी बाल-लीलाओं का अति मनोहारी चित्रण किया गया है। चौथे छंद में वे गोपियों के कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और उस प्रेम में उनके वेश को अपनाने की तीव्र लालसा को प्रदर्शित करते हैं।
7. सप्रसंग व्याख्या करो (लगभग 100 शब्दों में):
(क) 'मनुष्य हौं तो वही नित नंद की धेनु मँझारन।'
संदर्भ: प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के 'रसखान' (कृष्णा-महिमा) पाठ से ली गई है।
व्याख्या: इस पंक्ति के माध्यम से कवि रसखान अपनी गहरी कृष्ण-भक्ति को प्रकट करते हुए कहते हैं कि यदि मुझे पुनर्जन्म में मनुष्य का रूप मिले, तो मैं ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहना चाहता हूँ। और यदि भाग्यवश मुझे पशु का जन्म मिले, तो मैं कोई अन्य पशु न बनकर बाबा नंद की गायों के बीच हमेशा चरने वाला पशु बनना चाहता हूँ। कवि हर हाल में ब्रजभूमि और कृष्ण की लीलाओं का साक्षी बनना चाहते हैं।
व्याख्या: इस पंक्ति के माध्यम से कवि रसखान अपनी गहरी कृष्ण-भक्ति को प्रकट करते हुए कहते हैं कि यदि मुझे पुनर्जन्म में मनुष्य का रूप मिले, तो मैं ब्रज के गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहना चाहता हूँ। और यदि भाग्यवश मुझे पशु का जन्म मिले, तो मैं कोई अन्य पशु न बनकर बाबा नंद की गायों के बीच हमेशा चरने वाला पशु बनना चाहता हूँ। कवि हर हाल में ब्रजभूमि और कृष्ण की लीलाओं का साक्षी बनना चाहते हैं।
(ख) 'रसखान कबर्षों इन आँखिन. . करील के कुंजन ऊपर वारौं ॥'
संदर्भ: प्रस्तुत छंद-पंक्तियाँ महान कृष्णभक्त कवि रसखान द्वारा रचित सवैया से ली गई हैं।
व्याख्या: कवि रसखान कहते हैं कि पता नहीं वे दिन कब आएंगे जब वे अपनी इन आँखों से ब्रज के सुंदर वनों, बागों और तालाबों को निरंतर निहार सकेंगे। वे ब्रज की कटीली झाड़ियों (करील के कुंजन) को सोने के करोड़ों महलों (कलधौत के धाम) से भी अधिक मूल्यवान मानते हैं और उन पवित्र कटीली झाड़ियों पर संसार के समस्त महलों और वैभव को सहर्ष न्योछावर करने की इच्छा रखते हैं।
व्याख्या: कवि रसखान कहते हैं कि पता नहीं वे दिन कब आएंगे जब वे अपनी इन आँखों से ब्रज के सुंदर वनों, बागों और तालाबों को निरंतर निहार सकेंगे। वे ब्रज की कटीली झाड़ियों (करील के कुंजन) को सोने के करोड़ों महलों (कलधौत के धाम) से भी अधिक मूल्यवान मानते हैं और उन पवित्र कटीली झाड़ियों पर संसार के समस्त महलों और वैभव को सहर्ष न्योछावर करने की इच्छा रखते हैं।
(ग) 'धूरि भरे अति सोभित. पैंजनीं बाजतीं पीरीं कछोटी।'
संदर्भ: प्रस्तुत पंक्ति रसखान विरचित बालक कृष्ण के रूप सौंदर्य प्रसंग से ली गई है।
व्याख्या: कवि श्रीकृष्ण के बचपन के मनमोहक रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि धूल से सने हुए बालक कृष्ण का शरीर अत्यंत सुशोभित लग रहा है। उनके सिर पर बंधी हुई सुंदर चोटी उनके आकर्षण को और बढ़ा रही है। वे नंद बाबा के आँगन में हंसते-खेलते और खाते हुए घूम रहे हैं, उनके पैरों में सुंदर पैंजनी मधुर ध्वनि में बज रही है और उन्होंने कमर में सुंदर पीली कछोटी (धोती) पहन रखी है।
व्याख्या: कवि श्रीकृष्ण के बचपन के मनमोहक रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि धूल से सने हुए बालक कृष्ण का शरीर अत्यंत सुशोभित लग रहा है। उनके सिर पर बंधी हुई सुंदर चोटी उनके आकर्षण को और बढ़ा रही है। वे नंद बाबा के आँगन में हंसते-खेलते और खाते हुए घूम रहे हैं, उनके पैरों में सुंदर पैंजनी मधुर ध्वनि में बज रही है और उन्होंने कमर में सुंदर पीली कछोटी (धोती) पहन रखी है।
(घ) 'मोरा-पखा सिर ऊपर राखिहाँ ..... गोधन ग्वारनि संग फिरौंगा।'
संदर्भ: प्रस्तुत सवैया-पंक्ति रसखान के गोपी-भाव वर्णन खंड से उद्धृत है।
व्याख्या: कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपियाँ उनके प्रति अपने अनन्य प्रेम को प्रदर्शित करते हुए कहती हैं कि वे अपने कृष्ण का वेष धारण करने के लिए सिर पर मोरपंख सजा लेंगी, गले में गुंज की माला भी पहन लेंगी। वे कृष्ण की तरह पीला वस्त्र (पीतांबर) ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर ग्वालों और गायों के साथ जंगलों में घूमने को भी तैयार हैं, क्योंकि कृष्ण का रूप उनके हृदय को बहुत भाता है।
व्याख्या: कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपियाँ उनके प्रति अपने अनन्य प्रेम को प्रदर्शित करते हुए कहती हैं कि वे अपने कृष्ण का वेष धारण करने के लिए सिर पर मोरपंख सजा लेंगी, गले में गुंज की माला भी पहन लेंगी। वे कृष्ण की तरह पीला वस्त्र (पीतांबर) ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर ग्वालों और गायों के साथ जंगलों में घूमने को भी तैयार हैं, क्योंकि कृष्ण का रूप उनके हृदय को बहुत भाता है।
भाषा एवं व्याकरण ज्ञान
(क) निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखो :
• मानुष = मनुष्य
• पसु = पशु
• पाहन = पाषाण / पत्थर
• आँख = अक्षि / नेत्र
• छबि = छवि
• भाग = भाग्य
(ख) निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द लिखो :
| शब्द | पर्यायवाची शब्द (Synonyms) |
|---|---|
| कृष्ण | श्याम, गोपाल, मुरारी, माधव |
| कालिंदी | यमुना, सूर्यसुता, भानुजा, तरणिजा |
| खग | पक्षी, विहग, नभचर, पंछी |
| गिरि | पर्वत, पहाड़, अचल, भूधर |
| पुरंदर | इंद्र, सुरेश, देवराज, मघवा |
(ग) संधि-विच्छेद करो :
• पीताम्बर = पीत + अम्बर (दीर्घ संधि)
• अनेकानेक = अनेक + अनेक (दीर्घ संधि)
• इत्यादि = इति + आदि (यण संधि)
• परमेश्वर = परम + ईश्वर (गुण संधि)
• नीरस = निः + रस (विसर्ग संधि)
(घ) निम्नलिखित शब्दों के खड़ीबोली (मानक हिंदी) में प्रयुक्त होने वाले रूप बताओ :
• मेरो = मेरा
• बसेरो = बसेरा (निवास)
• अरु = और
• कामरिया = कमली / कंबल
• धूरि = धूल
• सोभित = सुशोभित
• माल = माला
• सों = से
(ङ) 'ता' प्रत्यय वाले पाँच भाववाचक संज्ञा-शब्द लिखो :

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