महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रश्नोत्तर (Important Additional Q&A): रसखान-कृष्णा-महिमा
अति संक्षिप्त प्रश्नोत्तर (एक शब्द/वाक्य वाले) :
प्रश्नोत्तर 1. कवि रसखान का जन्म और मृत्यु कब हुई थी?
उत्तर: रसखान का जन्म 1533 ई. के आसपास और मृत्यु 1618 ई. के आसपास हुई थी।
प्रश्नोत्तर 2. रसखान का जन्म किस राजवंश में हुआ था?
उत्तर: रसखान का जन्म दिल्ली के प्रतिष्ठित बादशाह-वंश में हुआ था।
प्रश्नोत्तर 3. रसखान की चार प्रामाणिक रचनाओं के नाम क्या हैं?
उत्तर: 'सुजान-रसखान', 'प्रेमवाटिका', 'दानलीला' और 'अष्टयाम' उनकी चार प्रामाणिक रचनाएँ हैं।
प्रश्नोत्तर 4. 'कृष्णा-महिमा' शीर्षक के अंतर्गत संकलित छंद कहाँ से लिए गए हैं?
उत्तर: ये चारों छंद रसखान की प्रसिद्ध कृति 'सुजान-रसखान' से लिए गए हैं।
प्रश्नोत्तर 5. रसखान को यमुना के तट पर सबसे पहले 'रामचरितमानस' की कथा किसने सुनाई थी?
उत्तर: रामभक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रसखान को सबसे पहले रामचरितमानस की कथा सुनाई थी।
प्रश्नोत्तर 6. कवि अगले जन्म में पशु के रूप में कहाँ चरना चाहते हैं?
उत्तर: कवि पशु के रूप में सदा बाबा नंद की गायों के बीच (मँझारन) चरना चाहते हैं।
प्रश्नोत्तर 7. 'पुरंदर धारण' का क्या अर्थ है और कृष्ण ने इसे क्यों धारण किया था?
उत्तर: 'पुरंदर धारण' का अर्थ है इंद्र के गर्व को चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाना।
प्रश्नोत्तर 8. 'काग के भाग कहा कहिये' से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इससे तात्पर्य उस कौए के परम सौभाग्य से है, जिसे साक्षात हरि (श्रीकृष्ण) के हाथ से माखन-रोटी छीनकर खाने का अवसर मिला।
संक्षिप्त एवं विस्तृत प्रश्नोत्तर (लघु व दीर्घ उत्तर) :
प्रश्नोत्तर 9. रसखान ने राजसी सुखों और राज्य-लिप्सा से खुद को दूर क्यों रखा?
उत्तर: रसखान कोमल हृदयवाले और अत्यंत भावुक प्रकृति के इंसान थे। जब उन्होंने श्रीमद्भागवत का फारसी अनुवाद पढ़ा, तो वे गोपियों के निश्छल कृष्ण-प्रेम से पूरी तरह अभिभूत हो गए। इस ईश्वरीय प्रेम के कारण उनके मन में संसार और राज-वंश के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया, और उन्होंने राज्य-लिप्सा तथा राजसी अभिमान को त्यागकर स्वयं को पूरी तरह कृष्ण-भक्ति में लीन कर दिया।
प्रश्नोत्तर 10. यदि कवि अगले जन्म में पत्थर (पाहन) बनें, तो उनकी क्या इच्छा है और क्यों?
उत्तर: यदि कवि अगले जन्म में पत्थर (पाहन) बनें, तो वे उसी गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र (पुरंदर) का अभिमान तोड़ने और ब्रजवासियों की रक्षा के लिए छत्र की तरह अपने हाथ में उठा लिया था। वे पत्थर बनकर भी अपने आराध्य के पावन स्पर्श और उनकी लीला के साक्ष्य का आनंद उठाना चाहते हैं।
प्रश्नोत्तर 11. 'या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर कौ तजि डारौं'— इस पंक्ति के माध्यम से रसखान की कैसी भक्ति प्रकट होती है?
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से रसखान की अनन्य और परम आत्मोत्सर्ग वाली भक्ति प्रकट होती है। कवि के लिए श्रीकृष्ण की लाठी (लकुटी) और कंबल (कामरिया) जैसी साधारण वस्तुओं का मूल्य संसार के सबसे बड़े सुखों से भी अधिक है। वे अपने आराध्य की इन तुच्छ लगने वाली वस्तुओं के सामीप्य के लिए तीनों लोकों (आकाश, पाताल, मृत्युलोक) के राजसी ठाट-बाट को भी पल भर में न्योछावर करने को तत्पर हैं।
प्रश्नोत्तर 12. गोपियाँ कृष्ण का सारा स्वांग रचने को तैयार हैं, पर मुरली को होठों पर रखने से क्यों कतराती हैं?
उत्तर: गोपियाँ श्रीकृष्ण से अगाध प्रेम करती हैं और उन्हें रिझाने के लिए मोरपंख, गुंज की माला, पीतांबर और लाठी लेकर उनके जैसा रूप (स्वांग) बनाने को पूरी तरह तैयार हैं। परंतु, वे कृष्ण के होठों पर रहने वाली मुरली (बांसुरी) को अपने होठों पर कभी नहीं रखना चाहतीं। इसका कारण यह है कि वह मुरली हमेशा कृष्ण के अधरों से सटी रहती है, जिसके कारण कृष्ण गोपियों को भूल जाते हैं। गोपियाँ उस मुरली को अपनी 'सौत' (सौतिया डाह) मानती हैं और ईर्ष्यावश उसे स्पर्श नहीं करना चाहतीं।
प्रश्नोत्तर 13. रसखान की काव्य-शैली और भाषा की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर: रसखान की काव्य-भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। उनकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता, मधुरता, सरसता और प्रवाह है। उन्होंने कहीं भी कृत्रिम या कठिन शब्दों का आडंबरपूर्ण प्रयोग नहीं किया है। उनके सवैयों में भावों की तल्लीनता और मार्मिकता कूट-कूट कर भरी है। दोहा, कवित्त और सवैया छंदों पर उनका अद्भुत अधिकार था, जिससे उनका पूरा काव्य संगीतात्मक और रसपूर्ण प्रतीत होता है।

No comments:
Post a Comment
Please do not enter any spam link in the comment box.